‘भारत रत्न’ के मोहताज हैं क्या दद्दा

ध्यानचंद को ‘भारत रत्न’ दिए जाने की मांग 1979 में उनके निधन के बाद से लगातार उठती रही है। हमेशा यही दलील दी गई कि किसी खिलाड़ी को ‘भारत रत्न’ देने का नियम ही नहीं है। सरकारी तौर पर ध्यानचंद को सम्मानित करने में हालांकि कोई कोर कसर नहीं छोड़ी गई। झांसी में उनकी प्रतिमा लगा दी गई। दिल्ली के नेशनल स्टेडियम का नामकरण उनके नाम पर कर दिया गया। उनके जन्म दिन को राष्ट्रीय खेल दिवस घोषित कर दिया। लेकिन उन्हें ‘भारत रत्न’ मानने में हमेशा सकुचाहट क्यों अपनाई गई, इसका तार्किक जवाब कभी नहीं मिल पाया। सचिन तेंदुलकर को ‘भारत रत्न’ दिए जाने पर हैरानी इस बात पर भी हुई कि आजादी के करीब सात दशक बाद तक किसी भी सरकार को यह समझ में नहीं आया था कि कोई खिलाड़ी भी ऐसी उपलब्धि पा सकता है कि उसे देश का रत्न मान लिया जाए।