‘पलटवार’ और ‘निशाना साधे जाने’ के बीच घिरे दर्शक

सुशील

 समाचार चैनलों पर खबर देने में सबसे आगे और सबसे अलग दिखने की होड़ में रिपोर्टर्स और ऐंकर्स जाने-अनजाने में भाषा के साथ खेल करने लगे हैं। वे अपनी ऐंकरिंग को प्रभावी बनाने के लिए ऐसे-ऐसे शब्दों का इस्तेमाल करते हैं जिसका कोई तूक नहीं बनता। खुद को समझदार और दर्शनीय दिखाने के द्धंद्ध में फंसे ये ऐंकर्स कभी-कभी बेहद मूर्खतापूर्ण व्यवहार कर बैठते हैं।

छोटे परदे पर वे हमारी पत्रकारिता के प्रतिनिधि हैं। तात्कालिक  कामचलाऊ  जानकारी से लैस, मगर इस दुविधा से त्रस्त कि उन्हें दर्शनीय ज्यादा लगना है या समझदार। इस चक्कर में, लंबे अनुभव (टीवी में तीन-चार साल के अनुभव को भी महत्वपूर्ण माना जाता है) के बावजूद, उनमें से कुछ गुडी-गुडी भर रह गए और कुछ के चेहरों पर एक अजीब दृढ़ता आ गई। यह खास कर तब दिखता है जब कोई बहस चल रही हो। कुछ को  हम  मशीनी अंदाज़ में  धाराप्रवाह बोलते देखते हैं। चाबी भर कर छोड़ दिए गए खिलौनों की तरह। मानो उन्हें आशंका हो कि वे कुछ भूल जाएंगे इसलिए जो कुछ भी उन्हें पता है उसे फटाफट उगल दें। जबकि दूसरों ने  आत्मविश्वास  के नाम पर हमलावर आक्रामकता अपना ली ताकि बहस में शामिल लोगों पर हावी दिखाई दें। फिर चाहे वह उनका अपना संवाददाता ही क्यों न हो। कुछ के पास अच्छे सवाल नहीं होते तो किसी-किसी को अपनी बुद्धिमत्ता का ऐसा रोग चढ़ा है कि यह पता ही नहीं लगता कि उनका सवाल क्या था और कहां वह खुद ही उसका जवाब भी देने लगे।  ये हमारे ऐंकर हैं।

थोड़ी देर बाद घटनास्थल पर मौजूद कोई दूसरा युवक या युवती उनसे संवाद करता दिखता है। दोनों मिल कर किसी घटना (या सूचना या बयान) की जैसी व्याख्या करते हैं वह खबरिया भाषा की बेहद खतरनाक परंपरा गढ़ रहा है। यह बीमारी अंग्रेजी के मुकाबले हिंदी में ज्यादा ही नहीं, कई गुना ज्यादा है।  ऐंकर और संवाददाता जैसी उक्तियों और वाक्यांशों का धुआंधार इस्तेमाल करते हैं वह पत्रकारीय भाषा के लिए खतरे की घंटी से कम नहीं है।

ऐंकरों और संवाददाताओं को आप रोजाना जो जुमले बोलते सुनते हैं उनमें एक है ‘कहीं न कहीं।’  इसका इफरात में इस्तेमाल होता है। किसी नेता ने कोई बयान दिया है तो उसके विश्लेषण में यह जुमला जरूर आ जाएगा। अगर ऐंकर ने कहीं न कहीं बोल दिया तो तय मानिए कि संवाददाता भी अपने जवाब में घुमा-फिरा कर कहीं न कहीं ले आएगा। हदें तो तब टूटती दिखती हैं जब कहा जाए कि ‘बाबा रामदेव के इस बयान से साफ है कि वे कहीं न कहीं कांग्रेस से बुरी तरह नाराज हैं।’ जैसे आपको कोई गूढ़ जानकारी दी जा रही हो।

इसी तरह एक शब्द है- ‘पलटवार।’ इसका प्रयोग काफी बड़े पैमाने पर किया जा रहा है। किसी विपक्षी नेता ने कोई आरोप लगाया तो मीडिया के लोग सत्ता पक्ष में उसका जवाब तलाशने निकल पड़ते हैं। कोई मंत्री या नेता घर पर सो रहा है। उसे खबर भी नहीं कि सरकार पर या उसकी पार्टी पर कोई आरोप लगाया गया है। यह पता चलने पर कि दरवाजे पर मीडिया के लोग आए हुए हैं वह कपड़े बदल कर बाहर आता है। उसे बताया जाता है कि क्या आरोप लगाया गया है। वह उस पर बोलने से कतराता है। मगर संवाददाता पीछे पड़ जाते हैं कि कुछ तो बोल दीजिए। आखिर वह मान जाता है। थोड़ी देर में आप चैनलों पर देखते हैं कि फलां नेता ने विपक्ष पर ‘पलटवार’ किया। उसकी प्रतिक्रिया पर अगर कोई और नेता कुछ टिप्पणी कर दे तो फिर वह भी पलटवार है। यानी वार पर वार की तर्ज पर पलटवार पर पलटवार। स्थिति कुछ ऐसी बन जाती है जैसे कोई युद्ध चल रहा हो। अगले दिन आप पाते हैं कि कल जो घमासान दिखाया जा रहा था वह सिरे से गायब है और अब नए पलटवार चल रहे हैं।  किसी नेता के बयान पर किसी दूसरे नेता की टिप्पणी को जब हम रोज पलटवार कहने लगते हैं तो वास्तव में हमारी समझ पलटवार कर रही होती है।

यही हाल ‘निशाना साधने’ का है। हमारे राजनीतिक किसी दूसरी पार्टी या उसके नेताओं के बारे में कुछ न कुछ बोलते ही रहते हैं। वह सब और कुछ नहीं, बस निशाना साधना है। और अगर किसी ने उसका जवाब दिया तो वह पलटवार हो गया। हिंदी न्यूज़ चैनलों के दर्शक पलटवार और निशाना साधे जाने के बीच बुरी तरह घिर चुके हैं।

आप अक्सर किसी न किसी नेता के बारे में सुनते हैं कि उसने ‘पत्ते खोलने से इंकार कर दिया’ या ‘पत्ते नहीं खोले।’ जब कोई नेता कुछ बता देता है तो वह ‘खुलासा’ कर देता है। नहीं बताता है तो पत्ते नहीं खोलता। ये ऐसे शब्द हैं जिनसे कोई अछूता नहीं बचा। चाहे कोई राजनीतिक हो, अफसरशाह, समाजसेवी या कोई खिलाड़ी हो, ये सब के सब या तो खुलासा करते हैं या फिर पत्ते नहीं खोलते या फिर पलटवार करते हैं। यहां तक कि अन्ना हजारे को भी खुलासा करने, पत्ते नहीं खोलने, पलटवार करने और निशाना साधने से नवाज़ा गया।  किसी विपक्षी नेता के दावे या आरोप को भी अगर खुलासा कहा जाए तो सीएजी की किसी रिपोर्ट को क्या कहा जाएगा?  ऐंकर और संवाददाता जब बार-बार इन शब्दों और वाक्यांशों का प्रयोग करते हैं तो असल में वे अपनी समझ के पत्ते खोल रहे होते हैं और खुद पर ही निशाना साधते दिखते हैं। दोनों मिल कर जब खुलासे का भी खुलासा करने लगते हैं तो वास्तव में खुलासा उनकी शब्द  सामर्थ्य का हो रहा होता है।

‘जाहिर सी बात है।’ इसे भी आप किसी न किसी चैनल पर लगभग हर समय सुन सकते हैं। ऐंकर और संवाददाता दोनों इसे पूरी निर्दयता से बार-बार उच्चारित करते पाए जाते हैं। कई मौके ऐसे होते हैं जब आप पांच मिनट के भीतर इसे इतनी बार सुनने का सुख प्राप्त करते हैं जितनी बार अपनी निजी जिंदगी में आपने पिछले साल भर में नहीं सुना होगा। कोई उनसे पूछे कि अगर कोई बात इतनी ही जाहिर है तो फिर आप बता क्या रहे हैं या क्यों बता रहे हैं?

टीवी की खबरों में हम अक्सर सुनते हैं कि मुद्दा यह नहीं बल्कि वह है या अमुक मुद्दा कहीं खो गया है या मुद्दे तो बहुत से हैं। मगर शायद  मुद्दा यह भी है कि हर चीज़ मुद्दा नहीं हो सकती। उनमें कुछ मसले होंगे, कुछ अड़चनें हो सकती हैं, कुछ शिकायतें भी हो सकती हैं, कोई विरोध या कोई आंदोलन भी हो सकता है।  अगर इनमें सभी चीज़ें मुद्दे हैं तो फिर अव्यवस्था और कुव्यवस्था जैसे बारीक दूरी वाले अलहदा शब्दों की पैदाइश ही व्यर्थ हो जाती।

यह समस्या तब और बड़ी लगती है जब आप पाते हैं कि हिंदी के अधिकतर अखबार खबरों के मामले में टीवी की नकल करने पर उतारू हैं। आज की टीवी की मुख्य खबरें कल के अखबारों का मुखपृष्ठ भरने लगी हैं। उनकी भाषा पर भी टीवी का प्रभाव देखा जा सकता है। यह और बढ़ सकता है। शायद उन लोगों को इससे फर्क न पड़े जो हिंदी वाले होते हुए भी सार्वजनिक रूप से अंग्रेज़ी की पुस्तकें और पत्रिकाएं पढ़ते देखे जाना चाहते हैं।

टीवी के न्यूज़ चैनलों से कम से कम सही और स्तरीय हिंदी तो कोई नहीं सीख सकता। न ही इस हिंदी से किसी अहिंदी भाषी के भीतर हिंदी के प्रति कोई जिज्ञासा उमड़ सकती है।  मीडिया में बोलचाल की भाषा का प्रयोग सर्वमान्य सिद्धांत है। मगर जिन उक्तियों की बात हम यहां कर रहे हैं क्या वे हमारी बोलचाल का हिस्सा हैं? कितने लोग हैं जो आपसी बातचीत में ‘पलटवार’, ‘पत्ते नहीं खोलना’ या ‘निशाना साधने’ का प्रयोग करते हैं?  लगता है मीडिया ने भाषा को रवानगी देने, उसे परिष्कृत करने, उसे सुरुचिपूर्ण और विस्तार योग्य बनाने की जिम्मेदारी छोड़ दी है।

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