विषयान् विषवत् त्यजेत

मान-बड़ाई-प्रतिष्ठा की इच्छा जाग्रत होने से अनेक दोष उत्पन्न हो जाते हैं जो मनुष्य के परम लक्ष्य की प्राप्ति में बाधक बनकर खड़े हो जाते हैं। शास्त्रों का मत है कि विषय को विष के समान त्याग देना चाहिए, इसी में कल्याण है।

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