जमता नहीं नातेदारी का रंग!

फिल्मी दुनिया में वैसे तो दबदबा नातेदारी का ही है। लेकिन जब असल जीवन की नातेदारी फिल्मों में उसी रिश्ते के रूप सामने आती है तो आमतौर पर रंग नहीं जम पाता। अपवाद कुछ जरूर हैं। लेकिन आम प्रचलन यही रहा है कि परिवारवाद के बल पर फलने फूलने वाले फिल्मी उद्योग में असल जिंदगी की नातेदारी को फिल्मों में दोहराया नहीं जाता। मसलन अगर कोई पिता-पुत्र अभिनेता हैं या पति-पत्नी का अभिनय से नाता रहाहै तो वे उस रिश्ते को परदे पर निभाने में असुविधा महसूस करते हैं। फिल्म की जरूरत के हिसाब से उस रिश्ते की प्रगाढ़ता दिखाना आसान भी नहीं होता। घर में रिश्तों का अलग अंदाज होता है। फिल्म में अलग तरह की स्थितियां होती हैं जिससे परदे पर रिश्ते स्वाभाविक नहीं दिख पाते।