बागपत खोदने में नया इतिहास

संजय श्रीवास्तव
भारत में ना तो आर्य बाहर से आए थे और ना ही यहां की सभ्यता मध्य एशिया से आई आक्रमणकारी जातियों का नतीजा है. बल्कि यूं कहा जाना चाहिए कि भारत में सभ्यता की नींव तब से बहुत पहले पड़ चुकी थी, जबसे आर्यों का भारत में आगमन माना जाता है. हालांकि बागपत के सिनौली में पिछले करीब 13 सालों से चल रही पुरातात्विक खोदाई इस ओर इशारा कर रही है कि अंग्रेजों द्वारा दी गई ये थ्योरी सिर से गलत है कि आर्यों ने भारत में आकर यहां नई सभ्यता की शुरुआत की. आर्य भारत में रथ, तेजी से दौड़ने वाले घोड़ों और ज्यादा दमदार शस्त्रों के साथ आए. जिसके सामने सिंधू घाटी सभ्यता के निवासियों के पैर उखड़ गए और वो दक्षिण की ओर कूच कर गए. बागपत के पुरातत्व में मिले अवशेष वाकई आंख खोलने वाले हैं और ये साबित करने वाले कि भारतीय सभ्यता में कुछ भी बाहर से नहीं आया, जो कुछ भी संस्कृतियां फली-फूलीं और नई सभ्यताओं का आगमन हुआ, वो खालिस यहीं की देन है.
दरअसल प्रचलित इतिहास पर सवाल बागपत की उस खोज से उठ खड़ा हुआ है,जिसमें पुरातत्वविदों को 5000 साल से कहीं अधिक पुराने अवशेष मिले हैं. वो अवशेष जिस तरह के हैं, वो संकेत देते हैं कि आर्यों के आने से कहीं पहले से हमारे यहां काफी उन्नत सभ्यता, युद्ध कलाओं और हथियारों का ज्ञान था. बागपत के सिनौली की खुदाई के निष्कर्षों को लेकर पश्चिमी उत्तर प्रदेश के इतिहासकार डॉक्टर अमित पाठक कहते हैं कि आर्यों के बाहर से आने की थ्योरी बिल्कुल गलत है. सौनोली में खुदाई में मिले अवशेष बता रहे हैं कि सिंधू घाटी सभ्यता से हजारों साल पहले पश्चिमी उत्तर प्रदेश कहीं उन्नत सभ्यता और ज्ञान की गवाह रही है. उनका कहना है कि यूं भी आर्यों के बाहर से आने के संकेत कहीं मिलते नहीं. ये कहना उचित नहीं होगा कि श्वेत त्वचा के लोग घोड़ों जैसे तेज गति के जानवर पर आए और वो आर्यों पर भारी पड़े.अमित पाठक कहते हैं कि सिनौली की मौजूदा खुदाई में जो रथ मिला है, उसे देखकर लगता है कि इसे कोई तेज गति का घोड़े सरीखा पशु चलाता रहा होगा. मिले हथियार ये बताते हैं कि 5000 साल पहले भारत में तांबे और लोहे के सामान बनाने का ज्ञान था. उनका कहना है कि सिंधू घाटी सभ्यता से पहले उत्तर भारत से लेकर अफगानिस्तान और बलूचिस्तान तक सांस्कृतिक जोन थे और लोग बेहतर जिंदगी जीने की कला जान चुके थे. भाषा बेशक इस जोन में अलग अलग इलाकों में अलग रही हो लेकिन वो आपस में मिलते थे.
ऐसा लगता है कि मैक्समूलर ने भारत के बारे में जो शुरुआती इतिहास लिखा है,वो आने वाले समय में शोध के बाद जरूर बदले जाने की स्थिति में आ जाएगा. भारत निर्माण और इसके पुरातात्विक महत्व को लेकर अब तक दिए तमाम तर्कों को सिनौली की मिट्टी झुठला रही है. उत्खनन में पहली बार सिंधु घाटी सभ्यता और कॉपर होर्ड कल्चर (ताम्रयुगीन संस्कृति) का सामंजस्य सामने आया है। एक ही स्थान पर दोनों ही सभ्यताओं के चिह्न के मेल ने हमारे वेद-ग्रंथों की बात पर मुहर लगा दी है.
एएसआइ की नजर में खोदाई में मिले सामान लगभग चार से पांच हजार वर्ष पूर्व के हैं. मिट्टी के नीचे दबे प्रमाण बताते हैं कि आर्यों के आने से कम से कम तीन हजार वर्ष पूर्व हमारे पूर्वज रथ बना चुके थे. उस समय की रॉयल फैमिली तांबे का भरपूर उपयोग करती थी. एएसआइ के सुपरिंटेंडेंट आर्कियोलॉजिस्ट रहे कमल किशोर शर्मा कहते हैं कि ये एक बड़ी खोज है. शर्मा कहते हैं कि पूर्व में आर्कियो-जेनेटिक्स भी स्पष्ट कर चुकी है कि हमारे डीएनए, क्रोमोजोम में पिछले 12 हजार वर्ष में कोई परिवर्तन नहीं हुआ. ऊपर से अब मिला ये आर्कियोलॉजिकल प्रमाण नए इतिहास की ओर संकेत कर रहा है. एक साल पहले यहां इसी इलाके में 160 कंकाल मिले थे, जिनकी कॉर्बन डेटिंग से पता चला था कि ये करीब चार से पांच हजार वर्ष पुराने हैं. हाल में सिनौली की खुदाई में तीन कंकाल, उनके ताबूत,आसपास रखी पॉटरी पर जहां सिंधु घाटी सभ्यता के चिह्न मिले हैं, वहीं लकड़ी के रथ में बड़े पैमाने पर तांबे का इस्तेमाल, मुट्ठे वाली लंबी तलवार, तांबे की कीलेंऔर कंघी कॉपर होर्ड मिलीं. रथ के लकड़ी का हिस्सा तो मिट्टी हो चुका है, लेकिन तांबा जस का तस है. खुदाई में मिले ताबूत और उसके पास से मिले सामान बताते हैं कि इन शवों का ताल्लुक किसी राजशाही परिवार से रहा होगा. ये भी पता चलता है कि हमारी प्राचीनतम सभ्यता में जानवरों का भी कितना सम्मान था. उन्हें भी सम्मान से दफन किया जाता था. साइट से मिले एक कुत्ते के कंकाल ने इस पर मुहर लगाई है. ताबूतों के ऊपर पशुपतिनाथ के सील जैसे चिह्न् मिले हैं, जो शिव मान्यता का प्रतीक है.. ये भी लगता है कि पांच हजार साल पहले भी महिलाएं श्रृंगार की बेहद शौकीन थीं. शवादान गृह में महिला के कंकाल के पास तांबे का शीशा और हड्डियों से बना कंघा मिलने से ऐसा लगता है. शवादान गृह में महिला के कंकाल के पास तांबे का शीशा और हड्डियों से बना कंघा मिला है.
अब इस उत्खनन में मिली महत्वपूर्ण सामग्रियों को लाल किला में संरक्षित किया जाएगा. जिनकी जरूरत होगी, उनका मॉडल बनाकर आम लोगों के लिए प्रदर्शित किया जाएगा. एएसआइ के संयुक्त महानिदेशक रह चुके और इंडियन आर्कियोलॉजिक सोसाइटी के महासचिव केएन दीक्षित इन प्रमाणों को इतिहास के लिए बहुत महत्वपूर्ण मानते हैं. उनका कहना है कि उन्होंने इस स्थान का पहले भी निरीक्षण किया है. इसमें कोई संशय नहीं कि ये स्थान चार हजार साल पुराने इतिहास को समेटे है. उनका कहना है कि सिनौली उत्खनन में मिले प्रमाण हमें अपने इतिहास को समृद्ध करने में अहम साबित होगा. बकौल उनके अंग्रेजों ने कभी हड़प्पा सभ्यता को मैक्समुलर थ्योरी के आगे नहीं आने दिया.
सिनौली ही नहीं बल्कि इस इलाके के आसपास भी 4000 ईसा पूर्व के अवशेष मिलते रहे हैं. कुछ समय पहले ही हरियाणा की राखीगढ़ी से कुछ अवशेष मिले थे.सिनौली गांव में वर्ष 2004-2005 में भारतीय पुरातत्व विभाग ने खुदाई कराई थी. लेकिन इस बार यहां जो कुछ भी मिला है, उसे दुर्लभतम ही कहा जाना चाहिए.
गौरतलब है कि इस पूरे इलाके को महाभारतकालीन इलाके के तौर पर जाना जाता है. इतिहासकार डॉ. केके शर्मा के अनुसार, ये इलाका कुरू जनपद का प्राचीन काल से केंद्र रहा है, जिसकी प्राचीन राजधानी हस्तिनापुर व इंद्रप्रस्थ (दिल्ली) रही है.
सिनौली के पास बरनावा में महाभारत काल के लाक्षागृह के अवशेष अब भी है. यहां से करीब 80 किलोमीटर दूर हस्तिनापुर है, जहां पांडव कालीन परिसर है,जिसे पुरातत्व विभाग ने संरक्षित किया हुआ है. इस परिसर मिट्टी के ऊंचे ऊंचे टीले हैं, जिनका आकार प्रकार बताता है कि इस इलाके में भी अगर दोबारा खुदाई का काम सुनियोजित तरीके से हो तो बहुत से अवशेष रूपी प्रमाण मिल सकते हैं. 1952 में जब हस्तिनापुर में प्रो बीबी लाल के निर्देशन में खुदाई हुई थी तब मृदभांड मिले थे. हालांकि ये खुदाई तब बहुत आगे नहीं बढ़ पाई थी. बरनावा के बारे में एएसआइ का मानना है कि बरनावा के टीले के नीचे बहुसांस्कृतिक मानव सभ्यता थी. हालांकि इसकी जांच होनी है. पुरातत्व विभाग भी मानता है बरनावा,सिनौली और हस्तिनापुर के बीच कोई कनेक्शन जरूर है. महाभारत के बारे में भी माना जाता है कि इसका इतिहास 5000 साल पुराना था. बरनावा में खुदाई में घर, चूल्हे तथा खिलौने बरामद हुए. इससे यह साफ है कि बरनावा के टीले के नीचे बस्ती रही है.
इतिहासकारों के मुताबिक यह काल सिंधु घाटी सभ्यता और उत्तर वैदिक काल की संधि अवधि हो सकती है. खुदाई से जुड़े डॉ. संजय मंजुल के अनुसार यह कह पाना अभी कठिन है कि इस स्थल का संबंध महाभारत काल से रहा होगा. इतना जरूर है कि महाभारत काल के अध्ययन को लेकर इस खोदाई ने इतिहासकारों को एक नया विषय दे दिया है. अमित पाठक का मानना है कि ईसा पूर्व जहां जहां विलुप्त हो गई सरस्वती नदी बहती थी, वहां ये प्राचीन सभ्यता विकसित हुई.
वैसे मेरठ के आलमगीर नाम के गांव हडप्पा काल से संबंधित अवशेष बहुत पहले मिले. हाल के बरसों में मुजफ्फरनगर और सहारनपुर में लगातार किसी पुरानी सभ्यता के अवशेष मिलने जारी हैं. यानि ये तो जाहिर है कि इतिहास में हमें जो कुछ भी मालूम है, तस्वीर निश्चित तौर पर उससे कहीं व्यापक है.
पूरे पश्चिमी उत्तर प्रदेश में हडप्पा कालीन अवशेष मिल रहे हैं, उससे साफ है कि इस इलाके का एक पुख्ता रिश्ता देश की सबसे पुरानी सभ्यता से था जरूर. इस इलाके में उन्नत बस्तियां थीं. यहां खेती होती थी. लोगों को तांबे और लोहे का काम करना आता था.
मेरठ के आलमगीर गांव में 50 के दशक में हडप्पाकालीन अवशेष मिले थे. फिर बागपत के पास कुछ संकेत मिले. मुजफ्फरनगर के मांडी गांव में प्राचीन आभूषण,मुहरें और बर्तन मिले. कुछ साल पहले सहारनपुर में भी जब ऐसा ही हुआ तो ये तय हो गया कि पश्चिमी उत्तर प्रदेश का इलाका निश्चय ही काफी खास इलाका रहा होगा. पिछले साल सहारनपुर में पुरातत्व विशेषज्ञों की टीम खुदाई करने पहुंची थी. वहां भी ऐसे ही अवशेष मिले थे.
सहारनपुर के सकतपुर गांव में पिछले साल भट्ठा मजदूर जब मिट्टी की खुदाई कर रहे थे तब उन्हें हड़प्पा सभ्यता कालीन तांबे की कुठार (कुल्हाड़ी) मिली थी. उस समय जब एएसआई टीम ने तीन फुट की खुदाई की थी तो पता चला कि पूरे चार एकड़ इलाके में प्राचीन सभ्यता के निशान बिखरे पड़े हैं. सकतपुर के अलावा सहारनपुर के कई गांवों हुलास, बाड़गांव, नसीरपुर और अंबाखेड़ी में मृदभांड मिले.

सरसावा का सिंधूकालीन टीला

सहारनपुर के सरसावा में एक टीला है, जिसे सिंधुकालीन टीला कहा जाता है. वैसे इस जगह को हुलास के नाम से जानते हैं, जो नानौता के मनोहर गांव में है. जहां ये टीला है, उस जगह को पुरातत्व विभाग ने तारों की बाड़ के जरिए संरक्षित किया हुआ है.
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