माया बिन सब सून

विद्याशंकर तिवारी
कैराना ने सियासतदानों को जो नया राजनीतिक ककहरा सिखाया और उससे पहले बेंगलुरू में हुए विपक्षी जमावड़े ने जो संदेश दिया उससे बीजेपी में बेचैनी है और पार्टी अध्यक्ष अमित शाह संपर्क से समर्थन के बहाने देश के प्रबुद्ध लोगों के साथ साथ सहयोगी दलों के नेताओं के मन का भी थाह ले रहे हैं। शिवसेना व जदयू जैसे सहयोगी दल मौके की नजाकत को भांपकर तोलमोल कर रहे हंै और साथ में यह जता भी रहे हैं कि जितना उन्हें बीजेपी की जरूरत है उससे कहीं ज्यादा बीजेपी को उनकी जरूरत है। चुनाव के अभी एक साल है और इस दौरान देश की राजनीति कई करवट लेगी लेकिन इस बीच राजनीति के केंद्र में बसपा सुप्रीमो मायावती आ गई हैं। बेंगलुरू में जिस तरह सोनया गांधी उनका हाथ थामे घूम रही थीं, उसमें राजनीतिक संदेश छिपा था और वह संदेश अब सतह पर दिखाई देने लगा है।
दरअसल आम चुनाव से पहले इस साल के अंत में उत्तर भारत के तीन राज्यों मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान में विधानसभा चुनाव है जिसे सेमीफाइनल माना जा रहा है। इन तीनों राज्यों में भाजपा की सरकारें हैं, मध्यप्रदेश व छत्तीसगढ़ में तो बीजेपी पन्द्रह साल से जमी हुई है जबकि राजस्थान हर बार रोटी पलट देता है। कर्नाटक ने कांग्रेस को जो संदेश दिया है, उसके बाद कांग्रेस सतर्क है और वोटों का बंटवारा रोकने के लिए बसपा और अन्य छोटे दलों को साथ लेकर इन राज्यों में चुनाव लड़ने की तैयारी में है ताकि बीजेपी को धूल चटायी जा सके। इससे बीजेपी और उसका शीर्ष नेतृत्व मोदी-शाह की जोड़ी सतर्क है और अनुसूचित जातिध्जनजाति व पिछड़ों को साधने के अलावा उसके नेताओं पर भी डोरे डाल रही है। बसपा सुप्रीमो मायावती बेशक अभी विपक्षी पाले में खड़ी हैं लेकिन अंदर की खबर यह है कि उनको भी साधने की कोशिश चल रही है और इसके लिए साम, दाम, दंड व भेद सब फार्मूेले आजमाए जाएंगे। बताते हैं कि पीएम पद को छोड़कर और कोई भी पद लेने की पेशकश उनसे की जा सकती है। अभी हाल में मायावती ने जिस तरह से संगठन में फेरबदल किया और अपने भाई आनंद कुमार को उपाध्यक्ष पद से हटाकर परिवारवाद का ठपा हटाया उसके अपने निहितार्थ हैं। उनके शासनकाल में चीनी मिलों की बिक्री में घपलेबाजी की जांच सीबीआई कर रही है। इसके अलावा यादव सिंह मामले में बेशक सीबीआई जांच की आंच सियासतदानों तक नहीं पहुंची लेकिन यह बात किसी से छिपी नहीं है कि यादव सिंह के तार सपा-बसपा के किन नेताओं से कैसे जुड़े थे और किन के दम पर दोनों पार्टियों के शासनकाल में उनकी तूती बोलती रही। वह माल बटोरकर बांटते गये और तीनों प्राधिकरणों में अपना सिक्का चलाया। आनंद कुमार को पद से हटाने को उनके खिलाफ किसी भी समय कार्रवाई की आशंका से भी जोड़कर देखा जा रहा है। बीजेपी की पहली कोशिश है कि माया को मायामोह में डालकर अपनी तरफ खींचा जाए और यदि ऐसा न हो पाए तो एससीध्एसटी के लिए ऐसा निर्णय लिया जाए कि चुनाव का पासा पलट जाए। इसमें सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद इस वर्ग को प्रोन्नति में आरक्षण देना, दलितों पर अत्याचार की बाबत कानून में संशोधन कर उसे मूल रूप में लाना तथा निजी क्षेत्र में आरक्षण देने जैसे कदम शामिल हैं। सहयोगी दल जदयू प्रमुख नीतीश कुमार, लोजपा प्रमुख राम विलास पासवान, व बीजेपी सांसद उदितराज जैसे नेता पहले से ही निजी क्षेत्र में आरक्षण की मांग करते रहे हैं। हालांकि यह फार्मूला बैकफायर भी कर सकता है इसलिए पार्टी फूंक फूंककर कदम रख रही है। बीजेपी की पहली कोशिश यही है कि ऐसे मामले जिससे सवर्ण मतदाताओं की नाराजगी का खतरा है उसमें न्यायालय के फैसलों की आड़ में ही फैसला हो तो ज्यादा अच्छा है। ठीक इसी तरह से पिछड़ों को साधने के लिए कोटे में कोटा का फार्मूला काफी पुराना है। उत्तर प्रदेश जैसे सूबे में इसे मूर्त रूप देने की तैयारी चल रही है, इसके पीछे पार्टी का तर्क है कि जिस तरह से अनुसूचित जनजाति कोटे का सबसे अधिक फायदा मीणाओं ने उठाया ठीक उसी तरह से उत्तर प्रदेश, बिहार जैसे राज्यों में यादवों ने जो कि सपा और राजद के वोट बैंक है। बिहार में पहले ही नीतीश कुमार अति पिछड़े और महादलित कार्ड खेलते रहे हैं।
बीजेपी के रणनीतिकारों को जो बात सबसे अधिक साल रही है वो ये कि मुजफ्फरनगर दंगे के बाद जाटों और मुस्लिमों का जो अलगवा हुआ था, वक्त और जरूरत ने उस खाई को पाट दिया हैं। कैराना-नूरपुर में यह साफ दिखा। गन्ना किसानों की बदहाली ने चैधरी चरण सिंह के जमाने की राजनीतिक फसल को खाद और जमीन मुहैया करा दिया है। चैधरी परिवार के तीसरी पीढ़ी के वारिस जयंत चैधरी जिस तरह से गांव-गांव घूमे और दंगे के बाद मुंह मोड़ने के लिए अफसोस जाहिर किया उससे भी फर्क पड़ा। दूसरी तरफ दलित-मुस्लिम एकता भी रंग दिखा रही है। मुस्लिम कभी बीजेपी के वोट बैंक नहीं रहे लिहाजा वह उनसे कुछ उम्मीद भी नहीं कर रही है लेकिन दलित-जाट या यूं कहें कि गन्ना किसानों की नाराजगी ने उसके पैरों तले जमीन खिसका दी है। यही वजह है कि परिणाम आने के तुरंत बाद सरकार ने गन्ना किसानों के लिए आठ हजार करोड़ का पैकेज दिया, चीनी का बफर स्टॉक बनाकर मिलों से चीन खरीद की दर निर्धारित कर उस पर कड़ाई से अमल का निर्देश दिया।
पिछले आम चुनाव में हिन्दी भाषी राज्यों में मोदी लहर थी। उत्तर प्रदेश, बिहार, राजस्थान, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, हरियाणा, दिल्ली, झारखंड, हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड की कुल 225 सीटों में से 190 पर भाजपा ने कब्जा कर इन राज्यों से न सिर्फ कांग्रेस बल्कि सपा, बसपा, जदयू और राजद जैसे क्षेत्रीय दलों को पानी पिला दिया था। गुजरात, महाराष्ट्र, कर्नाटक और असम जैसे महत्वपूर्ण राज्यों में भी लहर ने अपना प्रभाव दिखाया। 2009 के चुनाव में भाजपा को116 सीटें मिली थी और उसकी वोट हिस्सेदारी महज 18.8 फीसद थी जबकि कांग्रेस 28.55 फीसद वोट हिस्सेदारी के साथ 206 सांसदों वाली पार्टी बन गई थी। लेकिन 2014 के चुनाव में मोदी लहर ने पासा पलट दिया और बीजेपी 31.4 फीसद वोट हासिल कर 282 सीटें लेकर आई तो कांग्रेस 19.5 फीसद वोट हिस्सेदारी के साथ महज 44 सीटों पर सिमट गई। इतनी बड़ी जीत के बावजूद विपक्ष और विश्लेषक हमेशा बीजेपी की इस बात को लेकर आलोचना करते रहे कि वह एक तिहाई मतदाताओं का समर्थन भी हासिल नहीं कर पाई है लिहाजा अगले साल होने वाले आम चुनाव में बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह ने 50 फीसद वोट हासिल करने का लक्ष्य निर्धारित किया है लेकिन सबसे बड़ा सवाल यह है कि यह होगा कैसे ? जिस उत्तर भारत के समर्थन से बीजेपी ने पहली बार पूर्ण बहुमत की सरकार बनाई वहां पर एक होकर विपक्षी खम ठोक रहे हैं। बिहार और उत्तर प्रदेश के उपचुनाव में महागठबंधन का फार्मूला सफल रहा है इसलिए अब यह भ्रम भी नहीं रहा कि यादव जैसी दबंग जातियां और दलित एक साथ वोट नहीं करेंगे लिहाजा बीजेपी ने तय किया है कि कार्यकर्ताओं की नाराजगी दूर कर उन्हें संगठित किया जाएगा, छोटे-छोटे दलों को साथ जोड़ेंगे और साइबार सेना बनाई जाएगी। अगले तीन महीनों में पार्टी उत्तर प्रदेश में 2 लाख प्रशिक्षित सोशल मीडिया विशेषज्ञों की भर्ती करेगी। अभी हाल में बीजेपी के आईटी सेल के पदाधिकारियों की बैठक हुई थी जिसमें उपाध्यक्ष जेपीएस राठौर ने बताया था कि अगले लोकसभा चुनाव में राज्य में हर मतदान केंद्र पर एक साइबर योद्धा होगा। हर मतदान केंद्र में एक सोशल मीडिया टीम होगी, जो पार्टी की अन्य राज्य इकाइयों के लिए एक उदाहरण पेश करेगी।
अब बात कांग्रेस की, बेशक बीजेपी घिर गई है लेकिन उससे सीधे कांग्रेस को बहुत ज्यादा फायदा नहीं हो रहा है। वह क्षेत्रीय दलों की पिछलग्गू पार्टी बनती जा रही है, दिल्ली के लिए रास्ता देने वाले 120 सीटों वाले यूपी और बिहार की ही बात करें तो दोनों जगहों पर उसे दो दर्जन सीटें लड़ने के लिए मिल जाए तो बड़ी बात है। यूपी में सीटों के बंटवारे को लेकर बातचीत चल रही है। अभी तक जो जानकारी मिल रही उसके मुताबिक बसपा 30-35 सीटों पर चुनाव लड़ेगी जबकि सपा 25 पर संतोष कर सकती है। यूं तो कांग्रेस 20 सीटें मांग रही है लेकिन उसे दर्जन भर सीटें मिल जाए तो भी वह खुश रहेगी है, शेष सीटों पर लोकदल जैसे छोटे चल चुनाव लड़ेंगे। इसी तरह बिहार में भी कांग्रेस के कोटे में बहुत कम सीटें आएंगी। दक्षिण में उसके लिए बहुत ज्यादा गुंजाइश नहीं है, ऐसे में उसके सामने सबसे बड़ी चुनौती यह है कि वह अपने सीटें कैसे बढ़ाये ताकि परिणाम आने के बाद सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरे और पीएम पद पर उसकी दावेदारी बनी रहे। पंजाब, हरियाणा, दिल्ली, महाराष्ट्र, गुजरात, मध्य प्रदेश, राजस्थान व छत्तीसगढ़ जैसे राज्य उसे थोड़ा आॅक्सीजन दे सकते हैं लेकिन कितना यह सबसे अहम है।
एक बात गौर करने लायक है कि एनडीए खासतौर से बीजेपी यदि कमजोर हुई है और उससे कांग्रेस को कुछ हासिल नहीं हो रहा है तो फिर किसको फायदा हो रहा है। जाहिर सी बात है कि बीजेपी की कमजोरी से जो जगह बन रही है उसे क्षेत्रीय दल भर रहे हैं। जब पिछले आम चुनाव में मोदी लहर थी और उत्तर,पश्चिम व मध्य भारत में कांग्रेस समेत तमाम क्षेत्रीय दलों के तंबू उखड़ गये थे तब भी पश्चिम बंगाल, उड़ीसा, तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश व तेलंगाना जैसे राज्यों में क्षेत्रीय क्षत्रपों ने कड़ी टक्कर दी थी। क्षेत्रीय क्षत्रपों की मुखिया बनकर उभर रहीं ममता बनर्जी कर्नाटक चुनाव के बाद साफ कर चुकी हैं कि यदि कांग्रेस क्षेत्रीय दल से मिलकर चुनाव लड़ती तो यह नौबत नहीं आती और कांग्रेस को क्षेत्रीय दलों को उसका हक देना होगा। प्रकारांतर से देसी सियासत का इतिहास खंगाले तो पाएंगे कि क्षेत्रीय दलों की श्रेणी में रखी जाने वाली पार्टियों का विकास खास तौर पर 1967 के बाद तेज हुआ जब देश के स्वतंत्रता संग्राम में खास भूमिका निभाने वाली इंडियन नेशनल कांग्रेस पार्टी की देश के मतदाताओं पर पकड़ ढीली होने लगी। इस समय लगभग चार दर्जन राज्य स्तरीय पार्टियों को चुनाव आयोग की मान्यता हासिल है और लगभग दो दर्जन ऐसी हैं जिन्हें अब तक मान्यता नहीं मिली है। इनमें से कई अपने राज्य में सत्ता में हैं तो कुछ अपनी बारी का इंतजार कर रही हैं। क्षेत्रीय पार्टियों ने लोकप्रियता हासिल कर राष्ट्रीय पार्टियों के सामने चुनौती पेश कर दी है। इन्होंने राष्ट्रीय पार्टियों की ओर से क्षेत्र या राज्य विशेष की राजनीतिक और आर्थिक उपेक्षा को अपना आधार बनाया और आगे बढ़ीं। इस समय क्षेत्रीय पार्टियां आंध्र प्रदेश, बिहार, दिल्ली, नगालैंड, ओडिशा, तमिलनाडु, तेलंगाना व पश्चिम बंगाल जैसे राज्यों में अपने दम पर शासन कर रही हैं। सत्तर के दशक में कांग्रेस का वर्चस्व टूटा था और आपातकाल के बाद पहली बार केंद्र में गैर कांग्रेसी सरकार बनी थी जिसमें बेजेपी (तब का जनसंघ) भी शामिल थी। हालांकि यह सरकार ज्यादा दिनों तक नहीं चल पाई और ढाई साल में ही जमींदोज हो गई लेकिन उस प्रयोग से ही बीजेपी जैसी राष्ट्रीय पार्टी निकली जो कि तमाम उतार-चढ़ाव से गुजरती हुई आज रायसीना हिल्स पर काबिज है और उसी प्रयोग से कई क्षेत्रीय दल भी उभरे । जनता पार्टी दरकी तो कई हिस्सों में बंट गई। 1980 व 1990 के दशक में कई क्षेत्रीय दल अस्तित्व में आये। 1984 में कांशीराम ने बसपा का गठन किया तो 1992 में मुलायम ने सपा बनाई। ऐसे ही जनता दल व लोकदल के अलग-अलग धड़े बने। बसपा ने दलित राजनीति को हवा दी और सत्ता में हिस्सेदारी भी ली। इन क्षेत्रीय दलों के प्रभुत्व की वजह से राष्ट्रीय पार्टियों खासकर कांग्रेस का काफी नुकसान हुआ और कई राज्यों में कांग्रेस चैथे-पांचवें स्थान की पार्टी हो गयी। उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखंड, ओडिशा व पश्चिम बंगाल जैसे राज्य उसके हाथ से निकल गये। दक्षिण में तमिलनाडु व आंध्रप्रदेश में भी वह कमजोर हो गई। बीच चुनाव में राजीव गांधी की हत्या के बाद 1991 में कांग्रेस ने पीवी नरसिंह राव के नेतृत्व में जैसे तैसे सरकार बनाई थी। उसके बाद जब 1996 में लोकसभा चुनाव हुआ तो 235 सीटों पर क्षेत्रीय दलों ने जीत हासिल की । इसी दौर में कांग्रेस और भाजपा का वोट प्रतिशत मिलाकर भी औसतन 50 प्रतिशत के पास रहा। उसके बाद उतार चढ़ाव चलते रहे और क्षेत्रीय पार्टियां मजबूत होती रहीं 1989 से लेकर 2009 के चुनाव तक गठबंधन की सरकारें बनीं। मोदी लहर में हुए 2014 के चुनाव में जातीय समीकरण ध्वस्त हुए तो बीजेपी अपने दम पर 282 सीटें हासिल कर बहुमत में आई। बावजूद इसके वह सहयोगियों को साथ लेकर रायसीना हिल्स पहुंची लेकिन कांग्रेस 44 तक सिमट गई। इस चुनाव में बेशक बसपा का सफाया हो गया और सपा पांच सीटों पर सिमट गई लेकिन चोट ज्यादा कांग्रेस को लगी। दोनों पार्टियां मिलकर सिर्फ 326 सीटें ही जीत पाईं यानी कि बीजेपी 116 से 282 पर पहुंची तो कांग्रेस 206 से 44 पर आ गई। बाकी सीटें क्षेत्रीय दलों के खाते में गई। छोटी पार्टियों को 49 प्रतिशत वोट मिले जो कि कांग्रेस और भाजपा दोनों को मिलाकर मिले वोट 51 फीसद से महज दो फीसद कम है। आंकड़े बताते हैं कि पिछले छह लोकसभा चुनावों में छोटी पार्टियों के वोट प्रतिशत में कोई बड़ा बदलाव नहीं हुआ है और सिर्फ कांग्रेस -भाजपा के वोट प्रतिशत में ही बदलाव हुआ। छोटी पार्टियां लगभग बेअसर रही अलबत्ता यह जरूर हुआ कि उनके प्रतिद्वदी उसी राज्य में छोटे दल बने और बारी बारी से सत्ता में बैठे। तमिलनाडु, उत्तर प्रदेश व बिहार इसके सबसे बड़े उदाहरण हैं। 2014 का चुनाव कुछ मायनों में इसलिए अलग रहा कि पूर्वोत्तर और दक्षिण के अछूते रहने के बावजूद उत्तर और पश्चिम में जबरदस्त मोदी लहर थी। मोदी बड़ोदरा के साथ वाराणसी से भी चुनाव लड़े जिसका असर सिर्फ उत्तर प्रदेश में ही नहीं पड़ा बल्कि बिहार और झारखंड भी सध गये। यूपी में दो बड़ी क्षेत्रीय पार्टियों सपा और बसपा को काफी नुकसान हुआ, बसपा का सफाया हो गया जबकि सपा 5 पर सिमट गई इसके बावजूद दोनों को मिलाकर 42.12 प्रतिशत वोट मिले थे जो कि भाजपा को मिले वोट से सिर्फ आधा फीसद कम था। दोनों के अलग-अलग चुनाव लड़ने की वजह से भाजपा 71 सीटें और उसके सहयोगी दल दो सीटें यानी कि 73 सीटें जीतने में सफल रहे थे। लेकिन गोरखपुर, फूलपुर व कैराना में जब दोनों पार्टियां मिलकर चुनाव लड़ी तो पासा पलट गया। इस बीच कर्नाटक ने भी सीख दी है और उससे पहले प्रयोगों की धरती बिहार ने 2015 में बता दिया था कि मोदी की आंधी से बचना है तो मतभेदों को भूलाकर एकजुट हो जाओ। महागठबंधन का असली प्रयोग वहीं हुआ था जो अब देशभर में आगे बढ़ता दिख रहा है। मध्यप्रदेश, राजस्थान व छत्तीसगढ़ में होने वाले चुनाव में भी कांग्रेस बसपा और दूसरे दलों को जोड़कर चुनाव लड़ने जा रही है।
बेशक पीएम मोदी ने 1975 की मानिंद देश में आपातकाल नहीं लगाया है लेकिन नोटबंदी, बेनामी संपत्ति की जब्ती तथा सर्जिकल स्ट्राइक जैसे जो कड़े फैसले किये और पिछड़ों व दलितों को साधने के लिए जनधन, मुद्रा, मोदी केयर, उज्जवला व सौभाग्य के साथ सब्सिडी को सीधे खातें में ट्रांसफर करने के लिए जो कदम उठाने के साथ साथ विदेशों में देश की जो धाक जमाई उससे उनकी छवि एक मजबूत नेता की बनी। नौजवान बेरोजगारी से परेशान है लेकिन उसने अभी मोदी से उम्मीदें नहीं छोड़ी है। अपने चार साल के शासनकाल में मोदी ने विपक्ष को पूरी तरह से दरकिनार रखा जिससे विपक्ष की नाराजगी स्वभाविक है। पिछले चार साल में हुए विधानसभा चुनाओं और लोकसभा के उपचुनावों से विपक्ष को एक बात समझ में आ गई है कि मोदी को विपक्षी एकजुटता ही हरा सकती है लेकिन सबसे बड़ा सवाल है विपक्ष किसके नेतृत्व में चुनाव लड़ेगा, यदि वे बहुमत में आये तो कौन प्रधानमंत्री बनेगा। राहुल, ममता, शरद पवार, मुलायम सिंह यादव, मायावती या कोई अन्य क्षेत्रीय क्षत्रप। यह सवाल सबसे महत्वूर्ण है लेकिन विपक्ष इसका सामना नहीं करना चाहता। वह जान रहा है कि यदि अभी इस गुत्थी को सुलझाने बैठे तो वह उलझ जाएगी, महागठबंधन भी खतरे में पड़ जाएगा इसीलिए सीपीएम महासचिव सीताराम येचुरी जैसे नेता चुनाव बाद इस गुत्थी को सुलझाने की हिमायत करते हैं। इसके अलावा एक पेंच यह भी है कि पश्चिम बंगाल में सीपीएम को साधेंगे तो टीएमसी रुठेगी और टीएमसी को गले लगाएंगे तो कम्युनिस्ट पार्टियां आंख दिखायेगी। दोनों दलों के प्रमुखों का एक मंच पर आना अलग बात है और जमीन पर साथ उतरना अलग। एक साथ चुनाव लड़ने से अस्तित्व पर ही बन आएगी। इसमें कांग्रेस को भी दिक्कत है, पश्चिम बंगाल और केरल में सीपीएम उसकी प्रतिद्वंदी है। बीजेपी इन अन्तर्विरोधों का फायदा उठाने की ताक में है और दूसरी तरफ अपने कार्यकर्ताओं की नाराजगी दूर कर उन्हें संगठित करने में जुट गई है। बीजेपी को लग रहा है कि एक होकर छिटफुट चुनाव जीतने और आम चुनाव में काफी अंतर होता है। आम चुनाव में मतदाताओं का एक बड़ा वर्ग देश का नेतृत्व कौन करेगा, यह देखकर वोट डालता है और उसके पास मोदी जैसा कद्दावर नेता है जिसके पास सबको बिजली-पानी और छत मुहैया कराने का रोडमैप है। विपक्ष नेतृत्वविहीन है लिहाजा यह देखना दिलचस्प होगा कि मोदी-शाह की जोड़ी विपक्षी विपक्षी एकता से कैसे निपटती है !