हास्य के बदलते फिल्मों अंदाज

फिल्मों का शुरू से ही खास फार्मूला रहा हास्य पिछले कुछ सालों में दो तरह की धाराओं में बंट गया है। एक तरफ ‘ढिशुम’, ‘मस्ती’, ‘वेलकम’ या ‘नो एंट्री’ जैसी उन तमाम फिल्मों को रखा जा सकता है जिन्होंने हास्य को विकृत किया। संयोग से इनमें से ज्यादातर फिल्में बड़े सितारों की रही है। इस कथित मनोरंजक धारा से उलट छोटे बजट की कुछ फिल्मों ने औसत समाज की उलझनों, सपनों और बिषमताओं को गुदगुदाने वाले अंदाज में परोस कर एक ऐसा हास्य रचा जो आमजन से ज्यादा करीब था। यही वजह है कि बड़े बजट की फिल्मों का हास्य जहां बाक्स आफिस पर लगातार फीका होता गया वहीं सहज हास्य की धारा बहाने वाली फिल्मों ने खूब रंग जमा दिया। ‘हाउसफुल’, ‘मस्ती’, ‘क्या कूल है हम’ के तीसरे-चैथे सीक्वल की नाकामी और उसके मुकाबिल ‘बरेली की बर्फी’, ‘टॉयलेटः एक प्रेम कथा’, ‘शुभ मंगल सावधान’ आदि एक दर्जन से ज्यादा फिल्मों को मिली सराहना इसका प्रमाण है।