वाम और दक्षिणपंथ में बंटा

गौरी लंकेश की हत्या के बाद दिल्ली के प्रेस क्लब से लेकर बेंगलुरू तक जिस तरह के दृश्य देखने को मिले हैं, उससे देश में नए सिरे से एक मीडिया विमर्श शुरू हो गया है। कई मीडिया हाउस अब खुलकर एक्टीविस्ट की तरह व्यवहार कर रहे हैं। पत्रकारों के मंचों पर राजनीतिक दलों के नेता माइक पकड़कर सरकार के खिलाफ हुंकार भरते नजर आ रहे हैं। कई पत्रकार खुद एक्टीविस्ट की भूमिका में तब्दील होते दिख रहे हैं तो एक्टीविस्ट खुद को पत्रकार बताने लगे हैं। हाल की कुछ घटनाओं के मद्देनजर भारत में जिस तरह मीडिया खेमों और खांचों में बंटता हुआ नजर आ रहा है, यह स्वस्थ, स्वतंत्र और निष्पक्ष पत्रकारिता के लिहाज से शुभ संकेत नहीं हैं।