खेल

क्रिकेट

जमाने को बदल रहा है

संजय श्रीवास्तव
इंग्लैंड में वर्ल्ड कप क्रिकेट प्रतियोगिता चल रही है. इसमें हिस्सा ले रही तमाम टीमों को देखें तो पता लगेगा कि कुछ टीमें ऐसी हैं, जहां हालात अच्छे नहीं हैं, गृह युद्ध जैसी स्थिति है. कुछ देशों में क्रिकेट नए समाज को गढ़ रही है. कुछ जगहों पर क्रिकेट ने जीवन बदला है. हां, भारत से लेकर अफगानिस्तान और वेस्टइंडीज से लेकर बांग्लादेश तक की स्थिति यही है. 
वर्ल्ड कप क्रिकेट में शिरकत करने वाले देशों में क्रिकेट कहीं ना कहीं किसी हद तक बदलाव की वाहक बन रही है. अफगानिस्तान में क्रिकेट गृह युद्ध की विभीषिका में जलकर फिर खड़े हो रहे देश में जिंदगी और मनोरंजन दोनों का नया साधन है. कभी पाकिस्तान के शऱणार्थी कैंपों में रहने वाले गरीब अफगानियों के बच्चे पूरे देश को एक नए गर्व का अहसास दे रहे हैं.  अपने देश में रोल मॉडल बन चुके हैं.

एक जमाना था जब तालिबान ने अफगानिस्तान में सभी तरह के खेलों पर प्रतिबंध लगा दिया था. जो कोई खेलता दिखता उसे गोली से उड़ा दिया जाता था. लेकिन वर्ष 2000 में तालिबान ने जब क्रिकेट से बैन उठाते हुए उसे मनोरंजक करार दिया तो ये एक हैरतभरा कदम था. जब भी अफगानिस्तान की क्रिकेट टीम अब कोई बड़ा टूर्नामेंट या मैच खेलती है तो उसके लिए शुभकामना जाहिर करने वालों में तालिबानी सबसे आगे होते हैं.

सबसे ज्यादा क्रिकेट मैच अफगानिस्तान के उन इलाकों में देखे और सुने जाते हैं जो तालिबान नियंत्रित या असर वाला है. यहां तक की यहां की नेशनल टीम में भी कई खिलाड़ी इन्हीं इलाकों से आते हैं. जब अफगानिस्तान की टीम ने वर्ल्ड कप 2019 के लिए क्वालिफाई किया, उस दिन आसमान की ओर मुंह करके पूरे अफगानिस्तान में बंदूकों से गोलियां दागी गईं. लोगों ने सड़कों पर आकर जश्न मनाया. जब वर्ल्ड कप में अफगानिस्तान की टीम भी खेल रही है तो क्रिकेट का रोमांच वहां भी हावी है. अमूमन  अफगानिस्तान क्रिकेट टीम मैच खेल रही हो और अच्छा प्रदर्शन कर रही हो तो खुशी में तालिबानी दनादन हवाई फायरिंग शुरू कर देते हैं. “टेलीविजन अफगानिस्तान” ने विशेष तौर पर वर्ल्ड कप के ब्राडकास्ट अधिकार हासिल किए हैं. क्रिकेट मैचों को देखने के लिए अफगानिस्तान में हजारों टीवी सेट खरीदे गए हैं. लोग इसके सामने चिपके रहते हैं.

इंग्लैंड में जिस स्टेडियम में अफगानिस्तान की टीम खेल रही होती है, वहां हजारों अफगानी अपनी टीम का उत्साह बढ़ाने पहुंचते हैं. मौजूदा अफगान नेशनल टीम में कई क्रिकेटर ऐसे हैं, जिन्होंने अफगानिस्तान के गृहयुद्ध के दिनों में पेरेंट्स के साथ पाकिस्तान में शरणार्थी कैंपों की शरण ली थी. तब वो छोटे थे. जब उन्होंने पाकिस्तानियों को क्रिकेट खेलते देखा तो खुद इस खेल में रंगते चले गए.
जिस तरह अफ्रीका और लातीनी अमेरिकी देशों में गरीब और मामूली बस्तियों में बच्चे फटे कपड़ों को लपेटकर फुटबॉल खेलते हैं. ठीक उसी तरह एशिया के कई देशों में बच्चे लकड़ी के फट्टे को बैट बनाकर मामूली गेंद के साथ गलियों से लेकर बस्तियों तक क्रिकेट का आनंद लेते हैं. जिस तरह लातीनी और अफ्रीकी देशों के लिए फुटबॉल जिंदगी बदलने का एक जरिया बनता रहा है, कुछ वैसा ही हाल अफगानिस्तान, पाकिस्तान, भारत या बांग्लादेश में अब क्रिकेट का है.
80 के दशक में ताज मलूक खान ने पेशावर के काचा गारी रिफ्यूजी कैंप के बाहर ही अफगान क्रिकेट क्लब बनाया. 90 के दशक में छोटे-छोटे झुंड में जब लोगों की अफगानिस्तान में वापसी हुई तो क्रिकेट भी उनके साथ गया. शुरुआत में तालिबान ने सारे खेलों पर बैन लगाया हुआ था. क्योंकि वे मानते थे कि सारे खेल लोगों को नमाज से दूर करते हैं. बाद में तालिबान क्रिकेट को लेकर सॉफ्ट होता गया. फिर वो समय भी आया जब तालिबानी खुद कुछ देर के लिए अपनी क्लाशनिकोव गनों को किनारे रखकर क्रिकेट का आनंद लेने लगे.
इसी का नतीजा था कि उन्होंने क्रिकेट को अपनी प्रतिबंधित सूची से अलग कर दिया. इससे ये खेल देश में जगह-जगह खेला जाने लगा. अफगानिस्तान क्रिकेट एसोसिएशन की स्थापना हो गई. बताया जाता है कि एक साल पहले जब अफगानिस्तान को आईसीसी ने टेस्ट स्तर का दर्जा दिया तो खुश होने वालों में तालिबानी भी बड़ी संख्या में थे.
द इकोनॉमिस्ट की एक रिपोर्ट कहती है कि तालिबान ने आज तक कभी क्रिकेट मैचों को अपना निशाना नहीं बनाया है. वे कभी कहीं भी क्रिकेट खेलने वालों के बीच कोई हिंसा नहीं करते. उनकी तरफ से अपने साथियों को एक मौन संदेश है कि क्रिकेट के मैचों को शांति से होने दो. बहुत पहले इक्का दुक्का मौकों पर तालिबान के इस्लामिक स्टेट से जुड़े कट्टरपंथियों ने क्रिकेट मैच को निशाना बनाया था लेकिन हाल के दो दशकों में कुछ नहीं हुआ.
कुछ महीने पहले जारी रायटर की एक रिपोर्ट कहती है कि केवल यही एक ऐसा खेल है, जिसका तालिबान के कमांडर भी पूरा आनंद लेते हैं. तालिबान नियंत्रित गांवों में क्रिकेट मैचों के दौरान सैकड़ों दर्शकों की भीड़ इकट्ठा हो जाती है. इस दौरान कभी कोई झगड़ा नहीं होता. ये लोग अपनी नेशनल क्रिकेट टीम के फैन हैं.
रायटर से बातचीत में नांगरहार के खोगयानी जिले में तालिबान कमांडर मुल्ला बदरुद्दीन ने कहा, ”मुझे क्रिकेट से प्यार है. ये इलाका पाकिस्तान से सटा सीमाई इलाका है, जहां पिछले जाड़े में तालिबान लड़ाकुओं ने एक क्रिकेट टूर्नामेंट आयोजित किया और इसे देखने के लिए भारी भीड़ जुटी.” बदरुद्दीन ने ये भी कहा, ”जब अफगानिस्तान का मुकाबला दूसरी टीम से होता है तो हम उसे रेडियो पर सुनते हैं या टीवी पर देखते हैं. हम सोशल मीडिया पर भी स्कोर चेक करते रहते हैं.”
अब तो जब से अफगानिस्तान में हालात सुधरे हैं, जगह-जगह क्रिकेट अकादमियां खुलने लगी हैं. बच्चे गांवों और शहरों में क्रिकेट खेलते हुए दिख जाते हैं. हालांकि अफगानिस्तान के मौजूदा हालात विदेशी टीमों को वहां जाने की इजाजत नहीं देते, ऐसी स्थिति में अफगानिस्तान की टीम ने भारत में देहरादून में अपना बेस बनाया हुआ है. उसने विदेशी टीमों के साथ भारत में कुछ मैच भी खेले हैं.
अफगानिस्तान के ज्यादातर खिलाड़ी बहुत कमजोर पृष्ठभूमि से आते हैं लेकिन उनमें से ज्यादातर अब आईपीएल, बांग्लादेश प्रीमियर लीग, पाकिस्तान लीग में खेलते हैं और अच्छा खासा धन कमाते हैं. स्पिनर राशिद खान या बिग हिटर मोहम्मद नबी वहां के स्टार बन गए हैं. हर अफगान बच्चा उनकी तरह बनकर अपनी जिंदगी बदलना चाहता है.अक्सर जब अफगानिस्तान क्रिकेट टीम अच्छा खेलती है तो उनके तालिबान प्रशंसक मोबाइल या सोशल साइट्स पर बधाई संदेश भी भेजते हैं.
अगर राजनीति या कूटनीति की बात करें तो क्रिकेट ने अफगानिस्तान और भारत को और करीब ला दिया है.  भारत, पाकिस्तान, श्रीलंका, अफगानिस्तान औऱ बांग्लादेश पडोसी भी हैं और क्रिकेट कहीं ना कहीं उन्हें मिलाती भी है. समानता की  बात ये है कि ये सभी एशियाई देश आतंकवाद, गरीबी, असमानता और सियासी उठापटक से ग्रस्त भी हैं. ऐसे में इन सभी देशों में क्रिकेट अवाम को सुकून और आनंद देती है.

बांग्लादेश में पिछले कुछ समय से उथल-पुथल कुछ ज्यादा रही. पिछले कुछ समय में बांग्लादेश में धार्मिक कट्टरता भी दिखी और आतंकवाद भी सिर उठाता हुआ दिखा. लेकिन इसमें कोई शक नहीं बांग्लादेश की क्रिकेट इस सबके बीच भी चलती रही. बांग्लादेश टीम में मुस्लिम और हिंदू दोनों हैं. सभी मिलजुल खेलते हैं. बांग्लादेश क्रिकेट में पैसा अभी बेशक ज्यादा नहीं है लेकिन देश में क्रिकेट उसी तरह जीवन बनता जा रहा है, जैसे भारत में दिखता है. यहां भी गली-मोहल्लों और मैदानों में क्रिकेट खेलते बच्चे जगह जगह दिखते हैं. बांग्लादेश का राष्ट्गान आमार सोनार बांग्ला अब भी बांगला क्रिकेटरों की लहू में दौड़ता है. ये राष्ट्रगान गुरुदेव रविंद्र नाथ टैगोर ने लिखा है, जिसे बांग्लादेश ने अपने बनने के बाद 1971 में अपना किया. बांग्लादेश टीम में आधे से ज्यादा खिलाड़ी ऐसे बैकग्राउंड से आते हैं, जो मामूली और गरीब परिवारों से आते हैं. इन खिलाड़ियों को देशी विदेशी क्रिकेट लीग में खेलने के चलते पहचान भी मिल ही है और पहचान भी. वर्ल्ड कप उनके लिये बड़ा प्लेटफॉर्म है. यहां हर खिलाड़ी का अच्छा प्रदर्शन टीम को अगर नए स्पांसर्स दिलाएगा और खिलाड़ियों को नए करार. हां ये जरूर बांग्लादेश में क्रिकेट जीवन बदलने का साधन बनने लगी है. बांग्लादेश अब विदेशी निवेशकों के लिए ज्यादा मुफीद जगह बनकर उभर रहा है. ऐसे में उम्मीद है कि वहां की क्रिकेट को इसका फायदा मिलेगा.
पाकिस्तान के हालात भी बहुत अच्छे नहीं हैं. आर्थिक तौर पर डगमगाता हुआ ये देश आतंकवादियों को शह देने के चलते पूरी दुनिया में बदनाम हो रहा है. पिछले कुछ सालों से विदेशी टीमें पाकिस्तान खेलने नहीं जातीं. पाकिस्तान क्रिकेट बोर्ड का खजाना खाली है. ऐसे में वर्ल्ड कप उसके लिए मौका ही है. सेमीफाइनल में उसके पहुंचने का मतलब है नई उम्मीदों की शुरुआत. पाकिस्तान जैसे देश में भी अच्छी खबरें कम होती हैं लिहाजा ऐसे माहौल में क्रिकेट किसी घाव पर मरहम की तरह काम करता है. भारत की तरह वहां भी गली मोहल्लों में क्रिकेट की धूम रहती है. पाकिस्तान में भी केवल शहर नहीं बल्कि गांवों और मामूली घरों से खिलाड़ी निकलकर टीम में आ रहे हैं.
श्रीलंका की क्रिकेट लगातार ढलान पर है. वर्ल्ड कप में टीम का प्रदर्शन भी अब तक यही बताता है कि पिछले एक दशक में ये टीम और श्रीलंका की क्रिकेट में गिरावट आती गई है. हालांकि इसका जवाब देना आसान नहीं है. वर्ष 2008 में जब मंदी की मार दुनियाभर  में पड़ी तो इससे सबसे ज्यादा असर श्रीलंका क्रिकेट पर पड़ा. श्रीलंका क्रिकेट बोर्ड गलत वजहों से हमेशा चर्चाओं में रहा. अब श्रीलंका के पास ना तो बेहतर क्रिकेट का ढांचा है और ना अच्छे युवा क्रिकेटर. यूं भी श्रीलंका के सारे ही खेलों का बुरा हाल है.
कैरिबियन देशों में एक जमाने में एथलेटिक्स के अलावा क्रिकेट को लेकर जबरदस्त दीवानगी थी, 90 के दशक से उनकी क्रिकेट में जो गिरावट शुरू हुई तो वो अब लगता है संभलने की ओर है. वेस्टइंडीज से अब गजब के क्रिकेट के टैलेंट सामने आ रहे हैं, हालांकि उनका ध्यान नेशनल क्रिकेट से ज्यादा दुनियाभर में चल रहीं क्रिकेट लीग के जरिए पैसा बनाने की ज्यादा है. हालांकि ये भी सही है कि वेस्टइंडीज कई देशों के समूह की टीम का प्रतिनिधित्व करता है. लेकिन ये सही है कि वेस्टइंडीज के ज्यादा क्रिकेटर मामूली पृष्ठभूमि से आते हैं और उनके पास गजब की एथलेटिक क्षमता और क्रिकेट की योग्यता  है. ये हम सब बखूबी आईपीएल में देख चुके हैं. माना जा रहा है कि अगर कैरिबियन क्रिकेटरों की टीम एक टीम के तौर पर खेली तो ये सेमीफाइनल में पहुच सकती है.

अब भारत की बात करते हैं. एक जमाने में भारत के क्रिकेटर आमतौर पर मुंबई और दक्षिण भारत से आते थे. ये ज्यादा सवर्ण बैकग्राउंड और बेहतर परिवारों से ताल्लुक रखते थे. लेकिन अब मौजूदा टीम को अगर देखेंगे तो तकरीबन सभी क्रिकेटर कम आय वाले परिवारों से आये हैं. भारत का क्रिकेट सिस्टम और चयन सिस्टम यूं भी काफी भ्रष्ट और भाई भतीजावाद से भरा हुआ है. इस सिस्टम से अमूमन वही क्रिकेटर आगे निकल पाता है, जो बहुत प्रतिभाशाली और जीवटवाला हो, लिहाजा भारतीय खिलाड़ियों में अगर मानसिक जीवटता और लड़कर आगे बढ़ने का माद्दा कूट-कूटकर नजर आता है तो भारतीय क्रिकेट में हाल के बरसों में आये भरपूर पैसे ने उनकी जिंदगियों यूं बदल दिया है कि ये किसी सुनहरे सपने जैसा हो, वो चाहे विराट कोहली की जिंदगी हो या फिर धोनी के पास आई अकूत संपत्ति. भारतीय क्रिकेटर छोटे छोटे कस्बे और शहरों से आ रहे हैं और देश में एक नए किस्म के रोलमॉडल बन रहे हैं. इनमें से ज्यादातर पढ़े लिखे भी नहीं हैं लेकिन उनका एक ही सपना था कि वो किसी भी हालत में भारतीय टीम का सदस्य बनें, जब ऐसा हो जाता है तो लाखों नहीं बल्कि करोड़ों बच्चों के सामने क्रिकेट एक सपने और करियर की तरह उदय हो जाता है. इसमें कोई शक नहीं कि क्रिकेट ने बहुत हद तक हमारे देश के समाज, अर्थव्यवस्था और खेलों के प्रति हमारी पुरानी मान्यताओं को तोड़ा है.
हां, दुख इस बात का आप जरूर कर सकते हैं कि जिस तरह एशिया में क्रिकेट बदलाव का वाहक बन रहा है. वैसा अफ्रीकी महाद्वीप में नहीं हो पाया. जिम्बाब्वे, केन्या, और पूर्वी अफ्रीका जैसी टीमें वर्ल्ड कप में खेलीं लेकिन अब उन सभी की क्रिकेट दम तोड़ रही है. वो फुटबॉल की ओर ज्यादा जा रहे हैं. हालांकि उसकी एक वजह फीफा द्वारा अफ्रीकी देशों में ग्रास रूट पर चलाए जाने वाले कई कार्यक्रम और बेहतरी के चलाए जाने वाले कार्यक्रम हैं. लेकिन इंटरनेशऩल क्रिकेट काउंसिल इस मामले में खुद काफी पीछे है बल्कि वो अमीर और गरीब देशों के बीच भेदभाव भी करता है.
फोटो –वर्ल्ड कप में भारत ,पाक ,अफगानिस्तान ,श्रीलंका ,वेस्ट इंडीज ,आदि टीम ,धोनी ,कोहली ,भुवनेश्वर ..चार पेज ..अच्छे फोटो प्रयोग करे..तालिबानी क्रिकेट खेलते हुए ..