हिंदी को लेकर फिर बवाल ?

सुभाष चंद्र

नरेंद्र मोदी की अगुवाई वाली एनडीए सरकार के दूसरी बार सत्ता में आने के बाद त्रिभाषा फार्मूले संबंधी नई शिक्षा नीति के मसविदे पर विवाद गहराने लगा है.  पूरी दुनिया में भारत ही एक ऐसा देश है जहां सबसे ज्यादा भाषाएं बोली जाती हैं. विभिन्न संस्कृतियों और धर्मों का देश भारत सिर्फ एक या दो भाषाओ का नहीं बल्कि 461 भाषाओं का घर है, पर इनमें से 14 विलुप्त हो गईं. पर लोगों की सुविधा के लिए भारतीय संविधान में 22 भाषाओं को आधिकारिक भाषाओं का दर्जा दिया गया. जिसमें सबसे ज्यादा बोली जाने वाली भाषा हिन्दी ही है. देश के 41% लोग हिन्दी बोलते और समझते हैं.

इसरो के पूर्व अध्यक्ष के.कस्तूरीरंगन की अध्यक्षता वाली समिति ने शिक्षा नीति का जो नया मसविदा पेश किया, उसमें गैर-हिंदीभाषी राज्यों में स्थानीय भाषा और अंग्रेजी के साथ ही हिंदी सीखने की भी सिफारिश की गई है. लेकिन इस मुद्दे पर विरोध के तेज होते स्वरों को ध्यान में रखते हुए केंद्र सरकार अब डैमेज कंट्रोल पर उतर आई है. उसने सफाई दी है कि सरकार किसी भी प्रदेश पर कोई भाषा नहीं थोपेगी.

नई शिक्षा नीति का इंतजार लगभग दो साल से किया जा रहा था. कस्तूरीरंगन समिति ने मानव संसाधन मंत्री रमेश पोखरियाल निशंक को इसका मसविदा सौंपा था. नई शिक्षा नीति के मसविदे में कहा गया है कि एक अजनबी भाषा में अवधारणाओं पर समझ बनाना बच्चों के लिए मुश्किल होता है और अक्सर उनका ध्यान इसमें नहीं लगता. जहां तक संभव हो, कम से कम पांचवी कक्षा तक बच्चों की पढाई मातृभाषा में ही होनी चाहिए. इसमें कहा गया है कि छोटे बच्चों की सीखने की क्षमताओं को पोषित करने के लिए प्री-स्कूल और पहली कक्षा से ही तीन भाषाओं से अवगत कराया जाना चाहिए ताकि तीसरी कक्षा तक पहुंचते-पहुंचते बच्चे इन भाषाओं में बोलने के अलावा लिपि भी पहचानने लगें.  समिति ने कहा है कि बहुभाषी देश में बहुभाषिक क्षमताओं के विकास और उनको बढ़ावा देने के लिए त्रिभाषा फार्मूले को अमल में लाया जाना चाहिए. अगर कोई विदेशी भाषा भी पढ़ना और लिखना चाहे तो यह इन तीन भारतीय भाषाओं के अलावा चौथी भाषा के तौर पर पढ़ाई जाए.

वैसे, सबसे पहले 1968 में जारी की गई राष्ट्रीय शिक्षा नीति में त्रिभाषा फार्मूले का जिक्र किया गया था. इसके अनुसार हिंदीभाषी राज्यों में हिंदी और अंग्रेजी के अलावा एक दक्षिण भारतीय भाषा पढ़ाए जाने की बात कही गई थी. गैर-हिंदीभाषी राज्यों के लिए मातृभाषा और अंग्रेजी के अलावा हिंदी पढ़ाई जानी थी. लेकिन इस नीति को कभी पूरी तरह से लागू नहीं किया गया.

जस्टिस रंगनाथ मिश्रा की अध्यक्षता में गठित राष्ट्रीय धार्मिक व भाषाई अल्पसंख्यक आयोग ने वर्ष 2009 में त्रिभाषा फार्मूले को सख्ती से लागू करने की सिफारिश की थी. लेकिन उस पर भी अमल नहीं किया गया. अब खासकर दक्षिण भारतीय राज्यों में हिंदी थोपने के इस कथित प्रयास का बड़े पैमाने पर विरोध हो रहा है और तमाम राजनीतिक दलों ने एकजुट होकर इसके खिलाफ आवाज उठाई है. तमिलनाडु में डीएमके के सांसदों ने इसका विरोध करते हुए चेताया है कि अगर हिंदी को थोपने का प्रयास किया गया तो फिर आंदोलन होगा.

डीएमके राज्यसभा सांसद तिरुचि शिवा ने केंद्र को चेतावनी देते हुए कहा है कि अगर केंद्र सरकार ने तमिलनाडु के लोगों पर हिंदी भाषा को थोपने की कोशिश की तो प्रदेश के लोग सड़क पर उतरकर इसका पुरजोर विरोध करेंगे. तिरुचि कहते हैं, “सरकार अगर हिंदी को अनिवार्य रूप से लागू करती है तो यह आग में घी डालने जैसा होगा और प्रदेश के युवा इसके खिलाफ सड़कों पर उतर कर प्रदर्शन करेंगे. वर्ष 1965 का हिंदी-विरोधी आंदोलन इस बात की मिसाल है.”

डीएमके के अध्यक्ष स्टालिन कहते हैं, “त्रिभाषा फार्मूले से देश बंट जाएगा. तमिलनाडु में द्विभाषा नीति लागू है. अब बीजेपी अगर त्रिभाषा नीति को लागू करती है तो यह मधुमक्खी के छत्ते पर पत्थर फेंकने की तरह होगा.” तमिलनाडु प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष के.ए.अलागिरी कहते हैं, “केंद्र सरकार को किसी भी छात्र को जबरन हिंदी सीखने पर मजबूर नहीं करना चाहिए. छात्रों को अपनी पसंद की भाषा सीखने की छूट होनी चाहिए.” सीपीआई और सीपीएम के अलावा बीजेपी की सहयोगी पीएमके ने भी नई शिक्षा नीति का विरोध किया है. मक्कल निधि मैयम (एमएनएम) नेता कमल हासन कहते हैं, “मैंने कई हिंदी फिल्मों में काम किया है. लेकिन मेरी राय में हिंदी को किसी पर थोपा नहीं जाना चाहिए.”

शिक्षा नीति का यह विरोध पड़ोसी कर्नाटक से होते हुए अब पश्चिम बंगाल तक पहुंच गया है. यहां लेखकों व बुद्धिजीवियों के एक समूह ने केंद्र से बंगाल के स्कूलों पर जबरन हिंदी नहीं थोपने की चेतावनी दी है. राज्य के शिक्षा मंत्री पार्थ चटर्जी कहते हैं, “कस्तूरीरंगन समिति की सिफारिशों को लागू करने का मतलब हिंदी को थोपना है. केंद्र ने राज्यों से सलाह-मशविरा किए बिना एकतरफा तरीके से इस शिक्षा नीति को तैयार किया है. लेकिन बंगाल सरकार इसको स्वीकार नहीं करेगी.”

सीपीएम पोलितब्यूरो की ओर से रविवार को जारी एक बयान में कहा गया है कि इस तरह जबरन किसी भाषा को थोपना देश की एकता के हित में नहीं है. पार्टी ने इसके खिलाफ सड़को पर उतरने की चेतावनी दी है.
शिक्षा नीति के बढ़ते विरोध को ध्यान में रखते हुए केंद्र सरकार अब डैमेज कंट्रोल की कवायद पर उतर आई है. मानव संसाधन मंत्री रमेश पोखरियाल कहते हैं, “सरकार अपनी नीति के तहत सभी भारतीय भाषाओं के विकास के लिए कृतसंकल्प है. किसी भी राज्य पर कोई भाषा थोपी नहीं जाएगी.” उनका कहना है कि मसविदे पर विभिन्न पक्षों और आम लोगों की राय के बाद ही कोई अंतिम फैसला किया जाएगा.

दक्षिण भारतीय राज्यों में कथित तौर पर हिंदी भाषा थोपने को लेकर जारी विरोध पर पूर्व मानव संसाधन विकास मंत्री प्रकाश जावड़ेकर कहते हैं, “किसी पर कोई भाषा थोपने का विचार नहीं है. हम देश की सभी भाषाओं को प्रमोट करना चाहते हैं.” त्रिभाषा फार्मूले पर वह कहते हैं कि अभी यह प्रस्ताव है. आम लोगों की राय के बाद ही इस पर कोई फैसला किया जाएगा. नई शिक्षा नीति का मसविदा प्रकाश जावड़ेकर के मानव संसाधन विकास मंत्री रहते हुए तैयार किया गया था.

हिन्दी विरोधी लोगों का कहना है कि हिन्दी राष्ट्र भाषा नहीं है फिर हिन्दी का बोलबाला क्यों? पर आंकड़ों के हिसाब से तो ये सिद्ध है कि हिन्दी भाषा को भारत के सबसे ज़्यादा लोग समझते हैं. फिर भी हिन्दी छोड़कर अंग्रेजी भाषा को स्वीकार किया गया क्योंकि अंग्रेज़ी दुनिया भर में बोली जाती है. बोलबाला किसका है ये साफ ज़ाहिर है, भारत सिर्फ भारत नहीं इंडिया भी है. भारत का प्रशासन अंग्रेजी में बात करता है, यहां के न्यायालयों में इंसाफ भी अंग्रेजी में दिया जाता है, प्रशासनिक और व्यवसायिक परीक्षाओं में भी अंग्रेजी अनिवार्य है, प्रवेश परीक्षाओं में अंग्रेजी की परीक्षा देनी पड़ती है, अंग्रेजी न समझने वालों को अनपढ़ समझा जाता है, अंग्रेजी को भारत में हमने अपने इष्ट की तरह सम्मान दे रखा है, सरताज बना रखा है. पर क्या पहले कभी #Stop English Imposition या फिर #Stop English imperialism जैसा कुछ सुनने में आया?

ये सवाल हिन्दी विरोधी उन सभी लोगों के लिए है कि जो भाषा देश भर में सबसे ज़्यादा बोली जाती है, उसका सम्मान किए जाने पर इतना बवाल क्यों? भारत से प्यार करने वाले लोग ये बवाल अंग्रेजी के लिए क्यों नहीं करते? जिस भाषा ‘हिन्दी’ को दुनिया के अलग अलग देशों में रहने वाले लोग सीख रहे हों क्या वो भाषा संयुक्त राष्ट्र संघ की भाषा है? क्या हिंदी भारतीय न्यायालय, प्रशासन, शिक्षा, रोजगार पर कोई अधिकार रखती है? दुनिया भर के देश हमारे देश को किस नाम से जानते हैं- इंडिया या भारत? क्या देश विदेश में भारतीय दूतावास व उच्चायोग अपना काम हिन्दी में करते हैं? पर फिर भी हिन्दी से बैर क्यों?

भारत में सबको अपनी बात कहने की पूरी आज़ादी है और ये सोशल मीडिया वो मंच है जहां लोग खुलकर अपनी बात कहते हैं. पर जिस मंच को देश की समस्याओं पर चर्चा करने का मंच होना चाहिए था वो आज किसी को भी नीचा दिखाने और बहसबाज़ी का अड्डा बन गया है.

फोटो-दक्षिण में हिंदी का विरोध करते हुए , कस्तूरीरंगन समिति व्  मानव संसाधन मंत्री रमेश पोखरियाल निशंक,प्रकाश जावडेकर ..दप पेज