बिहारः चेहरे और सीटों पर घमासान

2019 के लोकसभा चुनाव में बिहार में एनडीए का चेहरा कौन होगा और किस घटग दल को कितनी सीटें मिलेंगी, इसे लेकर गठबंधन दलों में खींचतान शुरू हो गई है। आरजेडी और कांग्रेस उन्हें एनडीए छोड़कर साथ आने का आमंत्रण दे रहे हैं। ऐसे में वहां बीजेपी मुश्किल में फंसती नजर आ रही है।
अगले साल होने वाले लोकसभा चुनाव में बिहार में एनडीए का चेहरा कौन होगा? किस घटग दल को कितनी सीटें मिलेंगी? इसे लेकर एनडीए के भीतर राजनीतिक घमासान छिड़ गया है। इसकी थाह लेने के लिए हाल ही में आयोजित डिनर डिप्लोमेसी में आरएलएसपी के उपेंद्र कुशवाहा की गैरमौजूदगी और दूसरे पार्टी के नेताओं के बयानों से इतना तो साफ हो ही गया है कि बिहार में एनडीए के भीतर सबकुछ ठीक नहीं है।
जेडीयू का कहना है कि एनडीए में कई चेहरे हो सकते हैं, लेकिन बिहार में, एकमात्र चेहरा नीतीश का है। कोई भी बीजेपी नेता खुलकर इससे इनकार नहीं कर रहा है, लेकिन सूत्रों का कहना है कि जेडीयू अब सीट साझा करने के जिस पुराने फॉर्मूले की मांग कर रहा है, वह व्यावहारिक नहीं है।

बीजेपी का शीर्ष नेतृत्व बिहार में अपने सहयोगी जेडीयू के इस दखल के खिलाफ एक काउंटर कदम खोजने की कोशिश कर रहा है। जून के पहले हफ्ते में भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह ने बिहार की नब्ज टटोलने के लिए एलजेपी अध्यक्ष राम विलास पासवान के साथ बैठक की थी। उसी दिन जेडीयू की कोर टीम पटना में अपनी बैठक कर रही थी। हालांकि अमित शाह से मीटिंग के बाद पासवान ने कहा कि उन्होंने अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति अधिनियम, दलितों के लिए पदोन्नति में आरक्षण और बिहार के लिए विशेष स्थिति में बदलाव के मुद्दों पर चर्चा की। लेकिन सभी संभावनाओं में मुख्य एजेंडा राज्य में राजनीतिक स्थिति पर चर्चा करना था।

एलजेपी अध्यक्ष रामविलास पासवान के बारे में मशहूर है कि वो सियासी बयार भांप लेते हैं। 2004 में कांग्रेस के साथ हो गए तो सत्ता में रहे। 2014 में बीजेपी के साथ मिल गए। केंद्र में मंत्री हैं। यह बात दीगर है कि इस बार उनको ज्यादा तवज्जो नहीं मिली है। उनकी नाराजगी का अंदाजा अमित शाह को भी है। इसलिए पहले रामविलास पासवान से मिलने गए थे लेकिन पासवान अपने राजनीतिक पत्ते इतनी आसानी से नहीं खोलते। वो मौके के इंतजार में हो सकते हैं। कब वो दूसरी नाव पर सवार हो जाएंगे, कहना मुश्किल है।

उधर, जेडीयू महासचिव पवन वर्मा ने पार्टी मीटिंग में कहा कि बिहार में एनडीए को नीतीश कुमार के नाम पर ही चुनाव लड़ना होगा। उन्होंने कहा कि जेडीयू सबसे बड़ा दल है और नीतीश कुमार सबसे बड़ा चेहरा। 2019 लोकसभा चुनाव के लिए हुई मीटिंग में पवन वर्मा ने कहा कि हम अपने जीएसटी और विशेष राज्य के दर्जे के मुद्दे पर कायम हैं। बिहार को विशेष राज्य का दर्जा के लिए रामविलास पासवान ने भी इसका समर्थन किया है।

गौरतलब है कि पुराने फार्मूले के अनुसार 2009 में जेडीयू और बीजेपी ने साथ मिलकर लोकसभा चुनाव लड़ा था। उस दौरान बिहार की 40 सीटों में से जेडीयू ने 25 और बीजेपी ने 15 सीटों पर चुनाव लड़ा था। 2014 में परिस्थितियां बदलीं और जेडीयू, एनडीए से अलग होकर चुनाव मैदान में उतरा। उसे मात्र दो सीटों पर ही संतोष करना पड़ा जबकि उस चुनाव में बीजेपी को 22, एलजेपी को छह और आरएलएसपी को तीन सीटों पर जीत मिली थी। सम्राट चैधरी को मिलाकर लोकसभा में बीजेपी के अब 23 सांसद हैं। जाहिर है कि इस परिदृश्य में पुराना फार्मूला लागू करना मुमकिन नहीं है। जेडीयू के नवीनतम कदम पर बीजेपी नेता उचित प्रतिक्रिया के बारे में सोच रहे हैं।

जेडीयू के नवीनतम कदम के बाद अटकलें हैं कि या तो नीतीश कुमार विधानसभा चुनावों में अधिक सीटों के लिए दबाव बना रहे हैं या वह भाजपा के साथ अलग-अलग तरीकों से निपटने को तैयार हैं। लेकिन सवाल यह है कि वह यहां से अब कहां जाएंगें? इस बारे में उनके पार्टी के कुछ नेताओं का कहना है कि वह आरजेडी के साथ वापस जा सकते हैं, क्योंकि इसके कई पुराने नेताओं का कहना है कि यदि नीतीश वापस आना चाहते हैं, तो उनका स्वागत किया जाएगा। दूसरा विकल्प दलितों और ओबीसी को साथ लेकर तीसरा मोर्चा बनाना होगा। बीजेपी का दूसरा सहयोगी, आरएलएसपी भी इस मोर्चे का हिस्सा हो सकता है। अगर नीतीश इस विकल्प को चुनते हैं, तो बीजेपी को कोई समस्या नहीं होगी। लेकिन इन सभी ट्वीस्ट और मोड़ों के बीच बिहार की राजनीति दिलचस्प हो गई है।

बीजेपी का दूसरा सहयोगी दल आरएलएसपी भी सीटों के मुद्दे को लेकर एक्शन में है। उपेंद्र कुशवाहा ने फिर बिहार के लिए विशेष दर्जा देने की मांग बढ़ा दी है और यह भी कहा है कि सीट साझा करने की प्रक्रिया अभी पूरी होनी चाहिए। पिछले चुनावों के दौरान कुशवाहा की पार्टी को तीन सीटें मिलीं थीं और वह सभी पर जीतने में कामयाब रही थी। हालांकि उनके सांसदों में से एक अरुण कुमार ने आरएलएसपी के साथ अलग-अलग तरीकों का विभाजन किया, लेकिन यह एक तथ्य है कि कुशवाहा का वोट बैंक अभी बरकरार है।
उपेंद्र कुशवाहा को काबू में रखने के लिए बीजेपी ने आरजेडी छोड़ कर जीतन राम मांझी के साथ गए दिग्गज कुशवाहा नेता सम्राट चैधरी को भाजपा में शामिल कराया है। बताया जा रहा है कि तभी से उपेंद्र कुशवाहा बीजेपी की नीयत को लेकर आशंकित हैं। इसलिए वह भी चाहते हैं कि बीजेपी अभी से सीटों का बंटवारा कर दे। यह दिलचस्प है कि बिहार के वर्तमान राजनीतिक परिदृश्य में कुशवाहा सबसे बेहतर स्थिति में हैं। वह बीजेपी के साथ हैं। केंद्र में मंत्री हैं और उन्हें साथ रखने के लिए बीजेपी अभी भी उन्हें दो या तीन सीटें दे सकती है। इससे इतर, आरजेडी भी उनका स्वागत करने के लिए तैयार है। पिछले महीने जब लालू प्रसाद यादव एम्स में भर्ती थे, तो वह कुशवाहा ही थे, जो सबसे पहले उनसे मिलने गए थे। इसके अलावा यदि बिहार में कोई तीसरा मोर्चा बनता है, यानी नीतीश इस तरह की कोई पहल करते हैं तो वह कुशवाहा को भी साथ लेना चाहेंगे।

फिलहाल, बिहार में एनडीए का कुनबा दुरुस्त करने के क्रम में 7 जून को बीजेपी अध्यक्ष नित्यानंद राय ने डिनर का आयोजन किया था। इसमें एनडीए घटक दलों के सभी नेता शरीक हुए लेकिन आरएलएसपी के अध्यक्ष उपेंद्र कुशवाहा नहीं पहुंचे। बाद में आरएलएसपी की तरफ से औपचारिक बयान में कहा गया कि अचानक काम पड़ने की वजह से भोज में शामिल नहीं हो पाए हैं। लेकिन डिनर में न जाने पर सवाल जरूर खड़ा हो रहा है। पार्टी के लोगों का कहना है कि एनडीए मजबूत है, इसलिए आरएलएसपी की तरफ से कार्यकारी अध्यक्ष नागमणि और पार्टी के सांसद इस भोज में थे। दरअसल, जवाब जितना सहज दिया जा रहा है, उतना है नहीं। इसमें कई पेंच हैं। हालांकि नरेंद्र मोदी की अगुवाई में एनडीए को दोबारा सत्ता में लाना ही इस डिनर का मकसद था लेकिन कुशवाहा के ना आने से एनडीए की मजबूती पर सवाल उठ रहा है।

इधर लोक जनशक्ति पार्टी (एलजेपी) के नेता पशुपति कुमार पारस ने स्पष्ट कहा कि जीती हुई सीटें छोड़ने का प्रश्न ही नहीं है। एलजेपी के प्रमुख रामविलास पासवान के पुत्र और सांसद चिराग पासवान ने लोकसभा चुनाव में नीतीश के नेतृत्व को नकारते हुए कहा कि एनडीए की तरफ से लोकसभा का चुनाव नरेंद्र मोदी के नाम पर ही लड़ा जाएगा। विधानसभा चुनाव का चेहरा नीतीश कुमार हो सकते हैं। चिराग ने कहा कि नेतृत्व को लेकर राजनीति की जा रही है। उन्होंने सवालिया लहजे में कहा, श्बिहार में चुनाव का चेहरा सुशील मोदी और रामविलास पासवान क्यों नहीं हो सकते?श्

कांग्रेस और आरजेडी की तरफ से बिहार में एनडीए के सहयोगियों पर डोरे डाले जा रहे हैं। तेजस्वी यादव खुला निमंत्रण दे रहे हैं। एनडीए के बिहार के कई नेता कभी आरजेडी और यूपीए में भी रह चुके हैं। गैर बीजेपी पार्टियों को एकजुट करने की कवायद चल रही है। लालू प्रसाद यादव को फिर से जेल भेजने और जोकीहाट उपचुनाव के बाद बिहार में हालात तेजी से बदल रहे हैं।

फिलहाल बीजेपी के साथ जाने के राजनीतिक नफा-नुकसान का आकलन नीतीश कुमार भी कर रहे हैं। बिहार में बीजेपी के लिए मुश्किल है। वो ज्यादा सीटें किसी एक दल को नहीं दे सकती है। बीजेपी को एलजेपी को भी समायोजित करना है। कुशवाहा को भी मनाना है। हालांकि बीजेपी के लिए बदल रहे हालात में कुनबा जोड़कर रखने की चुनौती है, क्योंकि जीतन राम मांझी पहले ही एनडीए का साथ छोड़ चुके हैं। कोई और दल अब अलग ना हो, इसके लिए बीजेपी प्रयास कर रही है।
बिहार के उप मुख्यमंत्री एवं वरिष्ठ बीजेपी नेता सुशील मोदी का कहना है कि दल मिल गए हैं तो दिल मिलने में भी परेशानी नहीं है। डबल इंजन की सरकार बिहार में प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्री दोनों के चेहरे पर जनसमर्थन मांगेगी। सीटों के तालमेल में भी कोई मुश्किल नहीं होगी। इसमें कोई शक नहीं कि बिहार में एनडीए की पहली पारी में जेडीयू बड़े भाई की भूमिका में रही है। सुशील मोदी के इस गूढ़ बयान का जेडीयू भी गहनता से विश्लेषण कर रहा है।

फोटो दृ नित्यानंद द्वारा आयोजित दकं के भोज ,नीतीश ,अमित शाह ,कुशवाहा ,मांझी ,तेजस्वी यादव ,तीन पेज