गांगुली के सामने चुनौतियां

सौरव गांगुली भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड के अध्यक्ष चुने गए हैं। 8० साल से कहीं अधिक पुरानी इस खेल संस्था का अध्यक्ष पहली बार कोई खिलाड़ी बना है। यह स्वागतयोग्य है। अब तक तो व्यावसायी, ब्यूरोक्रेट या राजनीतिज्ञ ही इस खेल संस्था के प्रमुख बनते आए थे। करीब चार साल पहले बीसीसीआई में जिस सफाई और पारदर्शिता की सुधार की जरूरत महसूस की गई थी। अब तक वैसा तो नहीं हुआ। लेकिन सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या सौरव गांगुली के आने से बीसीसीआई में कुछ बदलेगा।
वैसे तो बीसीसीआई के इस चुनाव में अगर सौरव गांगुली के अध्यक्ष पर चुनाव को छोड़ दें तो साफ नजर आ रहा है कि ज्यादातर राज्य इकाइयों और पदों पर जिस तरह चुनाव हुआ है, उसमें भी भाई-भतीजावाद तो अब भी नजर आ रहा है। जिस श्रीनिवासन की हठधर्मी के कारण बीसीसीआई के मामलों में सुप्रीम कोर्ट को इस खेल संस्था के मामलों में दखलंदाजी करनी पड़ी। ऐसा लग रहा है कि वह फिर बीसीसीआई में गॉडफादर की तरह व्यवहार कर रहे हैं और उनके इशारों पर काफी कुछ वहां हो रहा है। यही बीसीसीआई की कमजोरी भी है कि वह ऐसे लोगों का कभी विरोध नहीं कर पाती और उनके इशारों पर ही नाचती है।
तमिलनाडु की राज्य इकाई का अध्यक्ष श्रीनिवासन की बेटी को बनाया गया है, जिनके पति गुरुनाथ मयप्पन आईपीएल में फिक्सिंग के दोषी पाए गए। इसके बाद उन पर आजीवन प्रतिबंध भी लगाया गया। ये वही मयप्पन हैं, जिन्हें श्रीनिवासन आखिर तक बचाने की कोशिश करते रहे और उन्हें बचाने के लिए एक बोगस जांच आयोग भी बनाया। लिहाजा श्रीनिवासन और उनके परिवार का अब भी काबिज रहना नियमों की आड़ में मजाक जैसा ही है। वहीं ये भी खबरें हैं कि बीसीसीआई के मौजूदा चुनाव में पर्दे के पीछे से श्रीनिवासन ने अपने तरीके से कोई डील की। माना जा रहा है कि बीसीसीआई अब उन्हें आईसीसी का चेयरमैन बनाने के लिए ताकत झोंकेगी।
हालांकि ऐसे हालात में एक पूर्व और सफल क’ान का बीसीसीआई अध्यक्ष बनना निश्चिित तौर पर बहुत बड़ी बात है। सौरव के सामने कई चुनौतियां होंंगी। उनके पास ज्यादा समय भी नहीं होगा। क्योंकि वह इस पद पर दस महीने के लिए ही होंगे। शायद बीसीसीआई के लिए सबसे बड़ी सफलता यही होगी कि वह इस संस्था में खिलाड़ियों को नई भूमिकाओं में स्थापित करे। ऐसे लोग जिन्होंने अतीत में क्रिकेट की संस्था को बदनामी दी हो या फिर वे जो बीसीसीआई को घर की जागीर समझते हों, उन्हें इस खेल संस्था से बाहर होना ही चाहिए। हालांकि ये आसान तो कतई नहीं है।
सौरव गांगुली को 9० के दशक के आखिर में तब भारतीय टीम की क’ानी सौंपी गई थी, जब ये फिक्सिंग की कालिख से दो-चार हो रही थी। तब यकीनन न केवल भारतीय टीम को इस मंझदार से निकालकर ले गए बल्कि टीम को नए तेवरों से लैस भी किया। उन्हीं के दौर में टीम इंडिया दुनिया की बेहतरीन टीमों में शुमार हुई। हालांकि क’ान के रूप में पारी और प्रशासक के तौर पर पारी में अंतर होता है। सौरव नई भूमिका में सफल रहेेंगे ताकि भविष्य में कहा जा सके कि क्रिकेटर भी एक सफल प्रशासक हो सकता है।
इसमें भी कोई शक नहीं कि बीसीसीआई ने पिछले कुछ सालों में शानदार काम किया है। भारतीय क्रिकेट आज पिछले दो दशक से बेहतरीन दौर में है, क्रिकेटरों को भरपूर पैसा मिल रहा है तो उसका श्रेय बीसीसीआई को देना चाहिए। भारत में कई अन्य खेल संस्थाएं भी हैं लेकिन उनमें से कोई भी बीसीसीआई के सामने कहीं नहीं ठहरती।
देश में शायद ही किसी खेल संस्था की संरचना और विकास इतने बेहतर तरीके से हुआ, जिस तरह क्रिकेट का। हां, यहां बंगाल के ही एक शख्स का नाम लेना चाहिए। वह जगमोहन डालमिया थे, जिन्होंने 2००1 में भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड के अध्यक्ष का काम संभाला था। भारतीय क्रिकेट बोर्ड के खजाने को भरने में अगर किसी शख्स का नाम आंख बंद करके लिया जा सकता है तो वह डालमिया ही होंगे। अब बंगाल से ही सौरभ बीसीसीआई की कमान संभाल रहे हैं तो यकीनन ये संस्था कुछ और नई मिसालें कायम करेगी।